अभाज्य में प्रतिरूप – एक खोज

लेखिका: ऋद्धि मान्ना

अनुवाद: अरुषी मल्होत्रा

Team Science Next Door

आशुतोष अग्रहरि

Master of Science, Chemistry

Indian Institute of Science Education and Research Bhopal, India

हम सभी अभाज्य संख्याओं के बारे में जानते हैं- वह संख्याएँ, जो केवल १ और स्वयं से विभाज्य हैं। किंतु आश्चर्य की बात यह है, कि आज तक हमारे पास कोई ऐसा सूत्र नहीं, जो हमें एक अंतराल के भीतर अभाज्य संख्याओं की संख्या या प्रधानों के स्थान की जानकारी देता है- यह पूरी तरह से अप्रत्याशित है!

अभाज्य संख्याएँ गुणन द्वारा सभी प्राकृतिक संख्याओं का निर्माण करते हैं और प्राकृतिक संख्याओं की श्रेणी में खास स्थान रखती हैं (मेरे विचार में तो वह रहस्यमय भी हैं!)। इनमें प्रतिरूप ढूंढना हमेशा से गणितज्ञों के लिए खोज का विषय रहा है।सूत्र की यह कमी गणितज्ञों के लिए एक चिढ़ का मामला रहा है, किंतु कूटलेखकों / क्रिप्टोग्राफर्स (जो कोड सुलझाते हैं) के लिए; आनंद का! चूंकि अभाज्य संख्याओं का कोई सूत्र नहीं है, बड़ी संख्याएँ उत्पन्न करना बहुत कठिन है। हमारे सभी एनक्रिप्शन सिस्टम इस तथ्य का उपयोग करते हैं।मूल विचार यह है कि एक बड़ी संख्या में जानकारी को कूटबद्ध किया जाए, जो दो बड़े अभाज्य संख्याओं का गुणनफल हो। कूटानुवाद (डिकोड) करने की कुंजी उन दो अभाज्य संख्याओं को जानने में है। चूँकि हमारे पास अभाज्य संख्याओं के लिए, या उनका अंतराल जानने के लिए सूत्र नहीं है, हमें बहुत सारी संख्याओं की एक-एक करके जांच करनी पड़ती है, जिसमें बहुत लंबा समय लग जाता है!

चूंकि यूक्लिड (यूनानी गणितज्ञ, जिन्होंने आधुनिक ज्यामिति का संस्थापन किया) ने ३०० ईसा पूर्व में यह साबित किया था, कि अभाज्य संख्या अनंत हैं। आज भी गणितज्ञ, संख्या रेखा पर अभाज्य संख्याओं के स्थान की पूर्वानुमान करने के लिए नए तरीके खोज रहे हैं।१८९६ में, बर्नार्ड रीमन, जॅक्क आडामार और चार्ल्स जीन द ला वॅले पूसान ने अलग अलग, स्वतंत्र रूप से ‘अभाज्य नंबर’ प्रमेय सिद्ध किया। इस प्रमेय की मदद से हम किसी भी दी गयी प्राकृतिक संख्या (N), से कम अभाज्य संख्याओं की गिनती पता कर सकते हैं। लगभग N/log(N) होने के नाते, इसे π (N) द्वारा दर्शाया गया है। यह हमें N से लगभग दो क्रमागत अभाज्य संख्याओं के बीच की औसत अन्तर भी दे सकता है।यद्यपि, अंततः हमारे पास अभाज्य संख्याओं के लिए एक अनुमान था; परंतु किसी भी उचित मान के N के लिए त्रुटि की संभावना इतनी बड़ी थी कि यह अनुमान लगाना असंभव था कि हमारा अगला अभाज्य कहां है। यहीं आती है रीमन परिकल्पना। बर्नार्ड नीमन द्वारा १८५९ में एक जटिल फलन के रूप में पेश किया गया रीमन ज़ीटा फ़ंक्शन, अभाज्य नंबर प्रमेय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अच्छी खबर यह है कि रीमन ने, अभाज्य नंबर प्रमेय साबित करने की प्रक्रिया में एक अनसुलझी परिकल्पना की, जिसमें रीमन ज़ीटा फ़ंक्शन शामिल है। इसे सुलझाने पर हमें सभी अभाज्य संख्याओं के लिए एक स्पष्ट सूत्र मिल सकता है!रीमन की परिकल्पना ज़ीटा फ़ंक्शन के शून्यों के स्थान के बारे में एक कथन है। जैसे २ को फ़ंक्शन f (x) = x-२ का शून्यक माना जा सकता है; एक जटिल फ़ंक्शन के शून्य, वह जटिल संख्याएं हैं जो ज़ीटा फ़ंक्शन को शून्य बनाते हैं।रीमन की परिकल्पना ज़ीटा फ़ंक्शन के सभी शून्यक की है, जिसका अर्थ है कि वे एक सम्मिश्र तल में क्षैतिज अक्ष पर १/२ को पार करने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा पर स्थित हैं। यदि आप सोच रहे हैं कि ये शून्य कैसे उन अभाज्य संख्याओं से संबंधित हैं, तो आपका इस तरह आश्चर्यचकित होना बिल्कुल उचित है।चूंकि अभाज्य नंबर प्रमेय के प्रमाण में ज़ीटा फ़ंक्शन शामिल है, हमारे सन्निकटन की त्रुटि को ज़ीटा फ़ंक्शन के शून्य के रूप में व्यक्त किया जा सकता है! इस तरह, जटिल प्लेन पर शून्य का पता लगाने से हमें अभाज्य संख्याओं के लिए एक स्पष्ट सूत्र मिलता है!रीमन परिकल्पना का प्रमाण, अभाज्य संख्याओं में पैटर्न के लिए मानव जाति की खोज में मुकुट महिमा होगा। यही नहीं, यह अनसुलझा प्रमाण एक सहस्राब्दी समस्या (मिलेनियल प्राॅब्लेम) भी है, जिसका पुरस्कार एक मिलियन डॉलर है! इस मामले में सफलता से; अपने इंटरनेट या बैंक लेनदेन को सुरक्षित करने के एक नए तरीके ढूंढने में मुश्किल हो सकती है। परंतु, यह मानवीय विवेक बुद्धि और जिज्ञासा की जीत होगी; यह हमें हमारे ब्रह्मांड के बारे में एक और दिलचस्प बात बताएगी।

Published by sciencenextdoorblog

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